Sunday, September 24, 2017

अंक - 28

लौट आने को
करता मनुहार
अपना गाँव

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

अंक - 28

नदी के पार
गूँजता अनहद
जलपाखी-सा

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

अंक - 28

अँधेरी रात
फटी चटाई पर
ज़ख्मी सपने

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

अंक 28

झलक रहा
दीये की रोशनी में
माँ का वदन

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

अंक 28

वनों में छूटे
पढ़ाई की भूख में
सब अपने

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

अंक 28

ढेकी कूटती
वह आदिवासिनि
जीवन्त कला

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

Sunday, January 15, 2017

अंक - 27

रामनिवास पंथी की ग्यारह हाइकु कविताएँ-


तोड़ते दम
खूँटियों पर टँगे
बाबा के वस्त्र
०००

दाँतों में दाबे
नायलोनी कोहरी
उतरी धूप
०००

नन्हें फूलों ने
लिखीं लघुकथाएँ
ओस बूँदों से
०००

नीड़ में गाती
पुरजोर टेक्नीक
कहाँ से लाती
०००

पतंगे जले
दीपक की बाँहों में
थोड़ी सी राख
०००

परिंदे उड़े
गंगा किनारे बैठी
सिर्फ खामोशी
०००

पलाश वन
सिन्दूर से नहाते
अलस्सुबह
०००

बगुले उड़े
आकाश बेल छूने
उन्मुक्त होने
०००

रात तो गई
उबरा नहीं गाँव
कोहरे में से
०००

शिल्प रचती
इल्म का समन्दर
बया भरती
०००

साधु-संत से
लंगोटी बाँधे आये
चिनार पत्ते

-रामनिवास पंथी
डलमऊ, रायबरेली

Saturday, December 17, 2016

अंक - 26

भाई को लाने
बेटी को भेजा स्वर्ग
माता-पिता ने

-दिनेश चन्द्र पाण्डेय

अंक - 26

रँग रही हैं
बादलों की कूँचियाँ
सपने मेरे

-मिथिलेश बड़गेनियाँ

अंक - 26

पिता के आँसू
पासिंग परेड में
बेटा टापर

जानकी वाही